वेद का जो जितना भी संकलन हुआ है आधुनिक काल में भारत में लाने का श्रेय महर्षि दयानंद सरस्वती (आर्य समाज संस्थापक) के द्वारा किया गया सन 1870 से 1881 के मध्य में |
उन्होंने जीवन काल में साधारण लोगों को वेद पढने का सन्देश दिया और उसके लिए उनका भाष्य (सरल अनुवाद) भी किया है, जिन जिन लोगों ने उनके द्वारा लिखे वेद पढ़े हैं उनमे बहुत से महानुभाव क्रांतिकारी (नरम-गरम दल ) हुए | मौलाना हजरत मोहानी ने तो ये तक कहा था की अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में भाग लेने वाले 95 % लोग तो आर्य समाज को पालन करने वाले ही थे |
यद्यपि वेदों के सही स्वरुप को कभी अंग्रेजों द्वारा प्रचारित नहीं होने दिया गया | और अंग्रेज केवल जर्मन नागरिक मैक्स मुल्लर का ही प्रक्षेपित वैदिक अर्थ प्रचारित करते रहे (मैक्स मुल्लर कभी भारत नहीं आया था )| गुलाम भारत जो अपने ज्ञान से वंचित किया गया था, उसको जिसका जैसा जी आया वैसा ही तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर दिया | पूर्व काल में भारत से पैसा, अर्थव्यवस्था लूटने आये आक्रान्ता इस्लामवादी व् इसाईवादी और आधुनिक काल में इसाई समर्थित मार्क्सवादी, माओवादी, जातिवादी, नक्सल्वादी और मुस्लिम लीग द्वारा सभी वैदिक कालीन ग्रंथों में जबरदस्त मिलावट करी गयी और उस झूठ का जम के प्रचार भी हुआ |
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| डॉ सुरेन्द्रकुमार, राहुल आर्य, राजीव दीक्षित आदि विद्वान जो बोलते हैं बाबा साहब के लिखे बोले के अनुसार ही कहते बोलते हैं और महात्मा बुद्ध के उपदेशों का प्रमाण भी रखते हैं| कृपया महात्मा बुद्ध के श्रेष्ठों का अनुसरण करने के उपदेशों को माने |
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