हम भारत के लोग

 

देश मे इस्लामिक युद्ध कब आरम्भ हो जाएगा?

भारत का इतिहास कोई आज का नही, अपितु हजारों वर्ष पुराना है। इतना पुराना कि कोई और धर्म का दूर दूर तक पता नही था फिर भी हम सदैव आपसी सौहार्द्र से रहे। यही नही, भारत ही एक ऐसा देश है जिसने हरेक पीड़ित शरणार्थियों का स्वागत किया। फिर चाहे वो मुस्लिम हों (जी हाँ, मुसलमान भी सर्वप्रथम अपनी जान बचाने भारत आये थे, और वे स्वयं हजरत मुहम्मद के परिवार से थे), यहूदी हो, पारसी हो या कोई और। यहाँ तक कि राजा दाहिर (जिनका नाम भी आजकल किसी ने नही सुना होगा) ने अपने शरण मे आये उन मुस्लिम शरणार्थियों की रक्षा के लिए अपने हजारों सैनिकों का बलिदान दे दिया पर उन शरणार्थियों को कोई छू नही पाया। किन्तु समय बीतने पर मुस्लिमों को छोड़ किसी और ने कभी भी भारत की संप्रभुता और मूल हिंदुत्व की विचारधारा पर आघात करने का प्रयास नही किया।

इस्लाम, जो केवल 1400 वर्ष पुराना है, आज 50 से अधिक देशों पर कब्जा कर के बैठा है। क्या किसी ने कभी सोचने का प्रयास किया कि आखिर इसका क्या कारण है? इस्लाम की उत्पत्ति अरब में हुई और ये इतना असहिष्णु रहा कि हजरत मोहम्मद की मृत्यु से पहले ही, जब इनका धर्म नया और अत्यंत सीमित था, खुद उनके धर्म मे सत्ता के लिए खून खराबा हुआ। खुद हजरत के बेटों को कत्ल कर दिया गया। और ये शुरुआती कुछ वर्षों में ही हो गया।

उसके बाद इस्लाम जिस किसी भी देश मे गया एक शरणार्थी बन कर गया किन्तु बाद में उस देश के मूल निवासियों का नाश कर वहां कब्जा कर लिया। और भारत के अतिरिक्त कोई ऐसा देश नही है जहाँ इस्लाम को कब्जा करने में 100 वर्ष से अधिक लगे हों। बांकी अगर केवल भारत की बात करें तो हम ये कैसे भूल सकते हैं कि किस प्रकार सैकड़ों वर्षों तक मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत को बुरी तरह लूटा और लाखों हिंदुओं का कत्ल क्या। मैं उनके नाम यहां गिनवाना नही चाहता। फिर भी कुछ लोग है जो उन कातिलों को भी महिमामंडित करने से नही चूकते। एक उदाहरण तो सैफ अली खान का है जिन्होंने अपने पुत्र का नाम तैमूर रखा है। ये उस तैमूर के नाम पर है जिसने दिल्ली में केवल 5 दिन के कत्लेआम में हर कोस पर हिंदुओं के सर का ढेर रखवा दिया था। यही इनकी इस्लामिक विचारधारा को सिद्ध करती है।

मैं बहुत कड़ी बात कर रहा हूँ किन्तु इस बात को नोट कर लें कि जो देश एक बार इस्लामिक हो गया वहाँ गैर मुस्लिमों का जीवित रह पाना असंभव है। आज किसी भी इस्लामिक देश को देख लें, वही हुआ है। सबसे नजदीकी उदाहरण पाकिस्तान है जहां आजादी के समय 22% हिन्दू और सिख थे और आज महज 75 वर्षों के बाद 1% भी नही बचे हैं। 45 वर्ष पूर्व बने बांग्लादेश में हिन्दू 60% से 20% पर आ गए हैं। दूसरे देशों को छोड़ दें, स्वयं अपने देश मे देख लें कि जिन राज्यों में मुस्लिम बहुसंख्यक है, वहां हिंदुओं और अन्य धर्मों के लोगों का जीना हराम हो गया है। क्या आपको पता है कि इस देश मे आज 700 से भी अधिक गांव ऐसे हैं जो हिन्दू शून्य (जी, मैंने 0 ही कहा)। आप सोच सकते हैं कि भारत जैसे हिन्दू बाहुल्य देश मे भी ऐसा हो सकता है?

दूसरी तरफ भारत को देखिए। आजादी के बाद पहली जनगणना 1952 में हुई थी और आखिरी जनगणना 2011 में। इन दोनों के बीच का अंतर देखेंगे तो आंखें फटी रह जाएंगी। 1952 से 2011 के अनुपात पर जरा ध्यान दीजिए, ये आंखें खोल देने वाला है:

  • हिन्दू 86% से 79% हो गए।
  • ईसाई 2.1% से 2.9% पर आ गए हैं।
  • सिख 1.8% से 1.7% हो गए।
  • बौद्ध 0.7% से 0.6% हो गए।
  • जैन 0.5% से 0.3% हो गए हैं।
  • लेकिन मुस्लिम 9% से 18% से ऊपर हो गए हैं!!!
    • सबसे अधिक इस बात का ध्यान रखें कि ये सरकारी आंकड़े हैं। अभी तो अवैद्य रूप से रह रहे बंगलादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को मैंने गिना भी नही है। अनुमान है कि केवल बंगाल में ही 1 करोड़ से ऊपर अवैद्य बांग्लादेशी रह रहे हैं।

जब भारत मे हर धर्म का प्रतिशत गिरा है वही केवल मुस्लिमों की संख्या में इतना उछाल (100%) संदेह उत्पन्न नही करता? आपको नही लगता कि 2021 की जनगणना भयावह होने वाली है?

कुछ उदाहरण और देख लें:

  • गंधार 100 साल में कंधार बना
  • कुंभा 100 साल में काबुल बना
  • पर्शिया 100 साल में ईरान बना
  • बाल्हीक 70 साल में बल्ख बना
  • कैकेय 70 साल में पेशावर बना
  • कंबोज 70 साल में बदख्शां बना
  • सुवास्तु 70 साल में स्वात घाटी बना
  • तक्षशिला 70 साल में रावलपिंडी बना

ये तो केवल वो देश/राज्य हैं जिनका विवरण हमारे धर्म ग्रंथों में भी आता है। बांकी देशों की बात नही करें तो अच्छा है, उनकी गिनती तो 50 से ऊपर पहुच चुकी है। मलेशिया, कंबोडिया, अफ्रीका, और अभी सबसे हालिया यूरोप, किन-किन की बात करें। ऐसे उदाहरणों से इतिहास पटा पड़ा है।

क्या ये हम भूल सकते हैं कि केवल और केवल मुस्लिमों के कारण ही हमारे महान देश का विभाजन हो गया। क्या पाकिस्तान का बनना हिंदुओं की आंतरिक जातिगत गृहयुद्ध का परिणाम था? उस समय भी हमारे पास एक मौका था कि इस विभाजन को बिल्कुल सही ढंग से करते ताकि भारत में कोई मुस्लिम और पाकिस्तान में कोई हिन्दू ना रहता, किन्तु हमने वो मौका खो दिया। मैं तत्कालीन राजनेताओं की मूर्खता पर बात नही करना चाहता, पर सत्य तो यही है। और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि जिन मुस्लिमों ने पाकिस्तान कभी मांगा ही नही था वहाँ पाकिस्तान बना दिया गया और भारत के जिन मुसलमानो ने पाकिस्तान के नाम पर हमारा जीना हराम कर रखा था, वे यहीं रुक गए। यही कारण है कि भारतीय मुसलमानों में आपको "टू नेशन थ्योरी" वाले महानुभाव भरे पड़े मिलेंगे।

आज जो मुस्लिम इस देश मे हैं, क्या केवल उनके लिए राजनीतिक तुष्टिकरण नही होता? कौन सा ऐसा राज्य है जो मुस्लिमों को केवल एक वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल नही करता? उसी राजनीतिक गंदगी का परिणाम है कि इस देश मे आज जातिगत आरक्षण पैर फैलाये बैठा है। ये तो जाति में बंटे लोग आपको दिखते हैं वो इसी आरक्षण का नतीजा है। मुफ्त की मलाई किसे नही चाहिए? अन्यथा क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि मराठा, जिनका साम्राज्य एक समय पूरे भारत पर फैला था, आज महाराष्ट्र में स्वयं को पिछड़ी जाति माने जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं ताकि उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके। यही हालत गुजरात के पटेलों, हरियाणा के जाटों और राजस्थान के गुर्जरों की है। क्या हमें ये नही दिख रहा कि हम कैसे बारूद के ढेर पर बैठे हैं?

अगर मैं सिर्फ दलितों की बात करूँ तो किस प्रकार गंदी रणनीति से पहले मुगलों, फिर अंग्रेजों और उसके बाद सबसे अधिक काले अंग्रेजों (हमारे राजनेताओं) ने धीरे धीरे हिंदुओं से काट दिया। हजारो वर्षों पूर्व कुछ ढोंगी ब्राह्मणों ने दलितों को जो अपने आप से दूर किया तो उसका फायदा सभी सत्ताधारियों ने जम कर उठाया। आज ये हालात है कि दलित अपने आप को हिन्दू ही नही समझते और खुले आम हिन्दू धर्म को गालियां देते हैं। उसपर वामपंथी पेरियरवादी जोंक भी हमारे देश में कम नही है जो इस खाई को बढ़ाये ही जा रहे हैं।

इसीलिए जातिगत दूरी, जो इस देश मे पैदा हो गयी है उसके लिए हिन्दू धर्म को दोष ना दें। किन्तु ये समस्या ऐसी भी नही है कि मुस्लिमों के ना रहने पर हम आपस मे लड़ मरें। भारत मे मुस्लिम केवल 700 वर्षों से हैं, उससे पहले क्या हम शांति से नही रहते थे? किन्तु मुस्लिमों के भारत मे आने के बाद जो 600 वर्ष मुगल शासकों ने इस देश की ऐसी तैसी की उसपर कोई बात नही करता। उसपर से हंसी इस बात पर आती है कि 600 वर्ष शासन करने के बाद भी मुसलमान अपने आप को पिछड़ा एवं असहाय ही बताते है।

मैं कभी ये नही कहता कि देश के सभी मुसलमान ऐसे हैं। कभी नही। किन्तु जो चुनिंदा देशद्रोही मुसलमान है उनके खिलाफ भी हमारे अपने राष्ट्रवादी मुसलमानों को ही आवाज उठानी होगी। ठीक वैसे ही जैसे देशद्रोही हिन्दू के विरुद्ध सभी राष्ट्रवादी हिन्दू खड़े हो जाते हैं। बिना उसके कोई समाधान संभव नही है। किन्तु वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष्य में तो ऐसा संभव नही लगता। अन्यथा कश्मीर से हिंदुओं के पलायन, मेवात जैसे देश के 700 से अधिक गांव हिन्दू विहीन हो जाने और शाहीन बाग जैसे मुद्दों पर मुसलमानों के साथ साथ सरकार की चुप्पी आगे भी देखने को मिलेगी। बांकी कसर ईसाई मिशनरी धर्मान्तरण कर पूरी कर ही दे रहे हैं।

वैसे भारतीय इतिहास में हिन्दू मुसलमान का झगड़ा 150 वर्षों से पहले कभी नही हुआ। लेकिन फिर हमारे देश मे सर सैय्यद और जिन्ना जैसे नेता पैदा हुए जिन्होंने सब बर्बाद कर दिया। अगर सब पहले जैसा हो जाये तो समस्या ही समाप्त हो जाएगी किन्तु ऐसा हो नही सकता क्योंकि आज राजनीति में ऐसे व्यक्ति बैठे हुए हैं जो केवल सत्ता को प्राप्त करवाने के लिए अपने माँ बाप को भी बेच सकते हैं। अन्यथा इस देश मे घुसे अवैद्य मुसलमानों को निकालने में मतभेद नही होता। आधुनिक भारत का इतिहास पढिये। आपको पता चलेगा कि किस प्रकार चंद मीर जफरों और जयचंदों ने इस देश की ऐसी तैसी कर दी। पढिये, बहुत मजेदार है।

इसीलिए एक तो अब मुसलमानों को अल्पसंख्यक कहना बंद करें क्योंकि वे इस देश के दूसरे बहुसंख्यक हैं। दूसरा सनातन हिन्दू धर्म शत-सहस्त्र वर्षों से सदैव सौहार्द पूर्वक रहा था और आगे भी उसी प्रकार रह सकता है। उसके लिए किसी धर्मविशेष की आवश्यकता नही। और हाँ, चूंकि आपने जातीय युद्ध की बात की है, आपसे अनुरोध है कि पहले जाति और वर्ण में अंतर पता कर लें।

मैंने जो कुछ भी लिखा है वो मेरे कोई निजी विचार नही है बल्कि कटु सत्य हैं। सब कुछ लिखित में है और सार्वजनिक है। सबसे दुर्भाग्य की बात ये है कि हम हिन्दू बड़े गर्व से कहते हैं कि भारत में तो मुस्लिमों के 700 वर्ष के शासन के बाद भी 75% हिन्दू हैं। ऐसी मूर्खतापूर्ण बात मैंने आज तक नही सुनी। क्या हमें दिखाई नही देता कि पिछले केवल 125 सालों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे हिन्दू देश ना केवल भारत से अलग कर दिए गए बल्कि आज ये पूर्ण मुस्लिम देश हैं। अगर सबको जोड़ कर हिन्दू मुस्लिम का % निकाला जाए तो हिन्दू अल्पसंख्यक ही जाएंगे। कभी आधे एशिया पर फैला हमारा आर्यावर्त अब केवल भारत तक सिमट चुका है और उसमें भी मुस्लिमों का तुष्टिकरण भयानक रूप से चल रहा है। इसलिए बजाय इस कठोर सत्य से भागने के, अपना जो सर हमने शुतुरमुर्ग की तरह रेत में धंसा रखा है उसे निकालिये और सच का सामना कीजिये।

और हाँ, नेताओं के चक्कर मे मत रहिये, ये अपने फायदे के लिए अपने माँ बाप को भी बेच सकते हैं। इसीलिए अपने विवेक का प्रयोग कीजिये।

अंत मे ये कहूंगा कि अपने धर्म की डोर को कस कर पकड़े रहें। विशेषकर अपने वाल्मीकि समाज (मुझे दलित शब्द पसंद नही) से कहूंगा कि आप इन घटिया राजनेताओं के चक्कर मे ना आये। कभी ना भूलें कि शुद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण (जाति नही) की भांति स्वयं परमपिता ब्रह्मा से ही उत्पन्न हुए थे। इसीलिए अपने हिन्दू होने पर गर्व करें क्योंकि अगर इस देश मे लोकतंत्र है तो वो केवल इसलिए कि भारत हिन्दू राष्ट्र है, अन्यथा किसी भी अन्य मुस्लिम देश देश को देख लें जहां लोकतंत्र की बत्ती सदियों पहले जला दी गयी है।

अतः ये मेरा स्पष्ट मत है कि अगर केवल हिन्दू रहे तो कोई समस्या नही होगी और ये देश के हित में ही होगा।

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